आयुर्वेद के अनुसार क्या है स्वच्छ पेयजल का समाधान

पेयजल की आधुनिक स्थिति
कहते हैं जल ही जीवन है मानव शरीर का 60% भाग जल है सदियों से मनुष्य नदियों झीलों और झरनों में उपलब्ध जल का ही प्रयोग करता रहा. प्राकृतिक नदियों झीलों तथा झरनों के अतिरिक्त मनुष्य ने कृत्रिम झीलें व जलाशय बनाए. पृथ्वी का लगभग 97% जल महासागरों या समुद्र में है इसके अलावा 2% जल बर्फ के रूप में हिम शिखरों हिमनदियों तथा ध्रुवों पर है. केवल 1% जल ही ताजा तथा प्रयोग करने लायक है, परंतु यह भी पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं है.

बहुत पहले मनुष्य अपने घर ऐसे जगहों पर बनाते थे जहां पानी सरलता से उपलब्ध होता था. यदि पानी का  स्रोत घट जाता था या सूख जाता था तो लोग कहीं और जाकर रहने लगते थे, जहां व्यक्ति को अच्छा और शुद्ध जल सरलता से प्राप्त हो सके. अब शायद ही कोई ऐसा जगह हो जहां व्यक्ति को  शुद्ध जल सरलता से प्राप्त हो सके, क्योंकि लोग विश्व में इधर-उधर फैले हुए हैं, इसलिए उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पानी काफी दूर दूर तक ले जाना पड़ता है. आधुनिक समय में जल को पीने योग्य बनाने के लिए बड़े स्तर पर जल का शुद्धिकरण किया जाता है जिसमें Sedimentation by storage, Filteration, क्लोरीनीकरण ओजोनीकरण(Ozonization), अल्ट्रावायलेट रेडिएशन प्रमुख है.

आयुर्वेद में जल का वर्णन
आयुर्वेद में जल के गुणों के बारे में विस्तार से बताया गया है. स्वस्थ्य या रोगी व्यक्ति का निर्वाह जल के बिना नहीं हो सकता. आयुर्वेद में आकाश से गिरने वाला जल  को अमृत के समान बताया गया है यह जीवन उपयोगी, तृप्ति कारक, हृदय के लिए हितकर, आनंददायक, थकावट  आदि को दूर करने वाला तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला शीतल, हल्का  होता है. जल आकाश से गिरने के बाद सूर्य चंद्र और वायु के स्पर्श से  स्थान एवं समय के प्रभाव से स्वास्थ्य के लिए अच्छा भी हो सकता है और बुरा  भी. मतलब जैसे देश काल का प्रभाव पड़ेगा उसी के अनुसार वह अच्छा या बुरा हो जाता है.

शुरुवाती वर्षा जल वायुमंडल अशुद्ध होने के कारण नहीं पीना चाहिए, क्योंकि इसमें वायुमंडल की अशुद्धियां घुल जाती हैं. आयुर्वेद के अनुसार वर्षा जल है अश्विन(अगस्त) मास में एकत्र करना अच्छा रहता है. वर्षा काल के आरंभ का जल दूषित होने के कारण इससे नहाने तथा पीने से फोड़े फुंसी जैसे बाह्य तथा अतिसार जैसे आंतरिक रोग हो जाते हैं.

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कीचड़ तिनके  तथा पत्तों के मिल जाने के कारण जो जल गंदा हो गया हो उसे नहीं पीना चाहिए जिस जल पर सूर्य चंद्रमा की किरणों का तथा शुद्ध वायु का  स्पर्श नहीं होता हो, पहली वर्षा का जल, जो जल गंदा हो, पचने में भारी हो, जल में झाग हो, अत्यधिक गर्म या ठंडा हो उस जल को भी नहीं पीना चाहिए.

आयुर्वेद में कुएं का जल झील का जल, तालाब का जल, नदी का जल आदि आठ प्रकार के जल बताए गए हैं. पूर्व की अपेक्षा पश्चिम  की ओर बहने वाली नदियों का जल श्रेष्ट बताया गया है. जल को शुद्ध करने के लिए जल को उबालना सूर्य की धूप में खूब तपाना या गर्म लोहे के टुकड़े को पानी में डालना आदि का प्रयोग जल को शुद्ध करने के लिए किया जाता था.

वर्षा का जल शुद्ध एवं पीने योग्य होता है. यदि हम इसे अच्छी प्रकार से एकत्र कर लें और किसी स्वच्छ टैंक में स्टोर कर ले तो इसे हम वर्षभर पीने के प्रयोग में ला सकते हैं. इसके लिए हम अपनी छत को अच्छी प्रकार से साफ कर दें और जब बारिश हो तो उसे जमीन में पक्का सीमेंटेड टैंक बनाकर उसमें स्टोर कर सकते हैं. टैंक को हम इस प्रकार बनाएं जिससे उसमें कोई बाहरी अशुद्धि ना जा सके. इस जल को हम पीने के प्रयोग में ला सकते हैं.

कितना और कौन सा जल पीयें
प्यास से अधिक जल  किसी को नहीं पीना चाहिए. पेट के रोग, अतिसार, क्षय रोग, रक्तपित्त, एनीमिया  से पीड़ित लोगों को थोड़ा जल पीना चाहिए. भोजन के बीच में थोड़ा थोड़ा जल पीने से शरीर सम रहता है. भोजन के अंत में जल पीने वालों तो शरीर मोटा हो जाता है. और भोजन के शुरू में जल पीने वालों का शरीर दुर्बल हो जाता है.

ठंडा जल पीने से नशा, मूर्छा,  बेहोशी थकावट, चक्कर आना, उल्टी, जलन, पित्त विकार, रक्त विकार आदि समाप्त हो जाते हैं.  इसी प्रकार गर्म जल जठराग्नि को प्रदीप करता है. भूख को बढ़ाता है, खाने को पचाने में मदद करता है, गले के लिए हितकर है, व हल्का होता है. वात विकार कफ विकार आदि को दूर करता है तथा ज्वर, खांसी, आदि रोगों में स्वास्थ के लिए फायदेमंद है.

कच्चे नारियल का जल मधुर, वीर्यवर्धक, शीतल, हल्का होता है. यह प्यास, वित्तविकास, वातविकार, को समाप्त करता है तथा पाचन शक्ति को बढ़ाता है. यह मुत्राशय को क्लीन करता है.

वर्षा ऋतु में वर्षा का जल श्रेष्ठ और नदी का जल पीने योग्य नहीं होता है.

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